
इस बार का एठ पे कमीशन कुछ ज्यादा ही कंफ्यूजिंग बनता जा रहा है भाई साहब।क्यों? क्योंकि पिछले पे कमीशन में जो नॉर्मल चीजें, एज एक्सपेक्टेड, एंप्लाइज के लिए होती थीं, —
इस बार का एठ पे कमीशन कुछ ज्यादा ही कंफ्यूजिंग बनता जा रहा है भाई साहब।क्यों? क्योंकि पिछले पे कमीशन में जो नॉर्मल चीजें, एज एक्सपेक्टेड, एंप्लाइज के लिए होती थीं, सरकारी कर्मचारियों के लिए होती थीं, इस बार उन चीजों पर भी कंफ्यूजन क्लियर हो रहा है। कुछ चीजें सरकार के द्वारा मना की जा रही हैं और कुछ चीजों में सरकार चुप्पी साधे हुए है—होगा भी कि नहीं होगा? तो सरकारी कर्मचारी के मन में बड़ा कंफ्यूजन है।वो क्या कंफ्यूजन है? नौ पॉइंटर शेयर करूंगा—नौ जगह, जहां पर क्लैरिटी नहीं है। एंप्लाइज को हो सकता है बड़ा नुकसान भी हो और बहुत सारी दिक्कतें हों।देखो, होता क्या है ना—मैं बचपन में जहां रहता था, वहां मोहल्ले में एक बनिए की दुकान होती थी। वो बनिए की दुकान चोर नाम से फेमस थी। बाद में, हालांकि, लोगों ने उसकी दुकान बंद करा दी। वो करता क्या था—जो भी सामान आपको देता था, उसमें थोड़ी बहुत मार लेता था। जैसे मान लो, उसको 1 किलो चीनी देनी है—तराजू के एक साइड 1 किलो का बटखरा होता था, लेकिन वो चीनी के नीचे 25 ग्राम का बटखरा अलग से जोड़ देता था। जिसकी वजह से 25 ग्राम कम चीनी होते हुए भी वह 1 किलो के बराबर दिखता था। तो 25 ग्राम चीनी तो मार ली ना उस बनिए ने। चावल हो, दाल हो, आटा हो—ऐसे हर चीज के साथ वो करता था। बाद में जब उसकी पोल खुली, तो लोगों ने मारपीट करके उसको भगा दिया।आप जब इस बार एठ पे कमीशन आते हुए देखोगे, तो आपको ऐसा फील होगा कि कहीं सरकार हमारे साथ वो बनिए वाला हाल तो नहीं कर रही है। क्योंकि बहुत सारी चीजें पहले बताई नहीं गईं, बाद में कुछ और बता दी गईं। चलो, डिटेल में बता देता हूं—हुआ क्या है।देखो, एठ पे कमीशन में सबसे पहली चीज—अभी रीसेंट घटना यह है कि डीए मर्जर की मांग को ठुकरा दिया गया है। ये मांग 30 साल पुरानी थी। अगर आप फिफ्थ पे कमीशन के डॉक्यूमेंट देखें, 1 मार्च 2004 का, तो उसमें साफ लिखा है कि जब-जब डीए 50% पूरा हो जाए, उसे बेसिक पे के साथ मर्ज किया जाए। ये 2004 में सीपीसी ने नियम बनाया था, जिसे बाद में हटा दिया गया।इससे एंप्लाइज का फायदा क्या होता था? डीए हर छह महीने पर बढ़ता है। मान लो, हर छह महीने 3% बढ़ता है। इस तरह बढ़ते-बढ़ते जब डीए 50% पहुंचता था, तो उसे बेसिक पे में मर्ज कर दिया जाता था। बेसिक पे बढ़ने का मतलब—एचआरए, टीए, पेंशन, ग्रेच्युटी जैसे बाकी कंपोनेंट भी बढ़ जाते थे। ओवरऑल सैलरी बढ़ जाती थी।अब क्या हो रहा है? 50% होने के बाद भी डीए बेसिक में ऐड नहीं हो रहा, जब तक नया पे कमीशन नहीं आता। और नया पे कमीशन आने में अभी समय है। करंट डीए 58% हो चुका है, लेकिन मर्जर नहीं होगा। सरकार ने साफ कहा है—मर्जर ऑफ एक्सिस्टिंग डियरनेस अलाउंस पर कोई प्रपोजल नहीं है। यानी इसे रिजेक्ट समझिए। यह बयान 1 दिसंबर 2025 को लोकसभा में दिया गया।इसका मतलब यह कि 30 साल पुरानी मांग को एक झटके में खारिज कर दिया गया। एंप्लाइज को इंटरिम रिलीफ भी नहीं मिलेगी। यानी 2025 में सेवंथ पे खत्म होगा और नया सिस्टम 2027 के बाद आएगा। इस बीच महंगाई बढ़ेगी, लेकिन रियल सैलरी वही रहेगी।दूसरा पॉइंट—सेवंथ सीपीसी खत्म होने के बाद एठ सीपीसी में जानबूझकर देरी। सेवंथ पे 31 दिसंबर 2025 को खत्म हो जाएगा, लेकिन एठ पे की रिपोर्ट 2027 के मिड तक आएगी। इंप्लीमेंटेशन 2027 के बाद होगा। इस डेढ़-दो साल के गैप में सैलरी नहीं बढ़ेगी। इस गैप का एरियर मिलेगा या नहीं—इस पर भी कोई अपडेट नहीं है।तीसरा पॉइंट—इंप्लीमेंटेशन डेट पर चुप्पी। सरकार ने कहा है कि इंप्लीमेंटेशन डेट बाद में डिसाइड की जाएगी। रिपोर्ट आने के बाद कब से सैलरी बढ़ेगी, एरियर मिलेगा या नहीं—सब “बताएंगे” मोड में है। पहले पे कमीशंस में डेट क्लियर होती थी, इस बार नहीं। इससे एंप्लाइज की फाइनेंशियल प्लानिंग पर असर पड़ेगा।चौथा पॉइंट—एरियर पर साइलेंस। पहले के पे कमीशंस में डिले का एरियर मिला था। इस बार टीओआर में एरियर का जिक्र नहीं है। अगर एरियर नहीं मिला, तो एंप्लाइज को भारी नुकसान होगा।इसके बाद टीओआर की बात आती है। टर्म्स ऑफ रेफरेंस में पहले सारी क्लैरिटी होती थी—इंप्लीमेंटेशन डेट, इंटरिम रिलीफ, एरियर। इस बार ये सब क्लियर नहीं है। एंप्लई यूनियन्स ने टीओआर रिवाइज करने की मांग की, लेकिन सरकार ने इग्नोर कर दिया।अगला पॉइंट—इन्फ्लेशन का बोझ। पिछले 10 साल में महंगाई तेजी से बढ़ी है—एजुकेशन, हेल्थकेयर, हाउसिंग, रियल एस्टेट। डीए छह महीने में रिवाइज होता है, लेकिन महंगाई रोज बढ़ती है। इसलिए डीए को रियल टाइम महंगाई से लिंक करने की मांग थी, जिस पर सरकार चुप है।पेंशनर्स का मुद्दा भी उठा। पहले टीओआर में पेंशन का जिक्र नहीं था। बाद में विरोध के बाद 2 दिसंबर 2025 को कंफर्म किया गया कि पेंशन इंक्लूड है। यहां भी लोगों को बनिए वाला फील आया।प्राइवेट सेक्टर में हर साल इंक्रीमेंट होता है। अगर ऐसा सिस्टम हो, तो हर 10 साल पे कमीशन का झंझट ही खत्म हो जाए। कमेटी, देरी, एरियर—सब खत्म। लेकिन अभी हर 10 साल में वही प्रक्रिया दोहराई जाती है, जिसका खर्च टैक्सपेयर्स उठाते हैं।अब एंप्लाइज की डिमांड और रियलिटी देखो—डीए मर्जर नहीं हुआ, अर्ली इंप्लीमेंटेशन नहीं हुआ, एरियर की गारंटी नहीं है, इंटरिम रिलीफ नहीं है, टाइमलाइन क्लियर नहीं है, फिटमेंट फैक्टर पर क्लैरिटी नहीं है। इसका असर यह होगा कि बेसिक सैलरी, एचआरए, टीए, पेंशन, ग्रेच्युटी—सब कम रहेगा। औसतन एंप्लाइज को लाखों का नुकसान होगा।अनसर्टेनिटी से स्ट्रेस, एंग्जायटी और डिप्रेशन बढ़ता है। फाइनेंशियल प्लानिंग मुश्किल होती है और सरकार पर ट्रस्ट कम होता है।निष्कर्ष—करीब 50 लाख सेंट्रल गवर्नमेंट एंप्लाइज और 69 लाख पेंशनर्स देश की सेवा करते हैं। क्या उनके साथ ऐसा व्यवहार ठीक है?Thank you for reading this blog. Comment mein zarur bataye ki yeh blog aapko kaisa laga.